
‘गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स’ नहीं, माननीयों के लिए GST का मतलब— ‘घूस, सेटिंग और ट्रांसफर’!
बस्ती के माननीय का नया 'फाइनेंशियल' फॉर्मूला: विकास पर तो लेंगे ही, अब टैक्स पर भी लेंगे कमीशन! चोर को मिला महाचोर: ठेकेदार चुरा रहा था GST, विधायक जी बोले— "अकेले-अकेले नहीं, आधा हमारा हुआ!"
अजीत मिश्रा (खोजी)
‘माननीय’ का नया आविष्कार: अब टैक्स पर भी ‘टैक्स’ काटेंगे देश के विकासदाता!
– विशेष व्यंग्य रिपोर्ट
- भ्रष्टाचार के विज्ञान में नया आविष्कार; विधायक निधि छोटी पड़ी, तो माननीय ने GST में ढूँढा अपना ‘हक’!
- साहब को हस्ताक्षर करना आए न आए, कमीशन का ‘ककहरा’ बिल्कुल कंठस्थ है!
- सफेद कुर्ते का ‘काला’ टैक्स: जब सरकारी टैक्स बना नेताओं की ‘अवैध वसूली’ का नया अड्डा।
- सड़क टूटे तो टूटे, पुलिया धंसे तो धंसे… बस माननीय का ‘विधायक सेवा कर’ सुरक्षित रहे!
- जनता पूछ रही सवाल: लग्जरी गाड़ियों में घूमने वाले माननीयों का पेट आखिर कब भरेगा?
- ठेकेदार और विधायक की ‘नूराकुश्ती’ में सरेआम नीलाम हुआ लोकतंत्र का भरोसा।
बस्ती। हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, बस सही हुनर की पहचान होनी चाहिए। अमूमन माना जाता है कि नेताजी सिर्फ जनता के वोटों और विकास कार्यों के बजट में से अपना ‘न्यायसंगत’ हिस्सा (कमीशन) बटोरते हैं। पुलिया टूटे तो टूटे, सड़क बनते ही उखड़ जाए तो उखड़ जाए, लेकिन नेताजी का हिस्सा सुरक्षित रहना चाहिए। पर बस्ती जिले के हमारे एक ‘दूरदर्शी’ और ‘प्रतिभाशाली’ माननीय विधायक जी ने भ्रष्टाचार के विज्ञान में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। उन्होंने सोचा कि जब सरकार हर चीज पर GST वसूल सकती है, तो वो ठेकेदारों के GST वाले हिस्से पर अपना ‘विधायक सेवा कर’ क्यों नहीं लगा सकते?
भ्रष्टाचार का ‘डिजिटल इंडिया’: जब GST में भी बंटा हिस्सा
अब तक जनता ने सिर्फ सुना था कि विधायक निधि बेचने और उसमें से मोटा कमीशन खाने का खेल चलता है। कान पक चुके थे ये सुनते-सुनते। लेकिन इस बार माननीय ने जो दिमाग दौड़ाया है, उसे देखकर बड़े-बड़े चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) और अर्थशास्त्री भी अपनी डिग्रियां फाड़कर लोक सेवा आयोग की तैयारी छोड़ दें।
मामला कुछ यूं है कि सरकार ने विकास कार्यों के लिए बजट दिया। ठेकेदार ने काम किया और नियमानुसार 18\% GST कटकर उसे भुगतान मिलना था। अब ठेकेदार महोदय अपनी चालाकी में माहिर, वो हर महीने कागजों पर भुगतान ‘शून्य’ दिखाकर GST की चोरी करने की फिराक में थे। लेकिन शेर को सवा शेर मिल गया! हमारे माननीय विधायक जी को जैसे ही भनक लगी कि ठेकेदार साहब 16\% से 18\% की GST डकार रहे हैं, माननीय ने तुरंत अपनी ‘नैतिक जिम्मेदारी’ निभाई। उन्होंने ठेकेदार का कॉलर पकड़ा और कहा— “अकेले-अकेले चोरी करोगे? लाओ, आधा हिस्सा यानी 8\% से 9\% हमारे खाते में ट्रांसफर करो!”
व्यंग्य का नया समीकरण: > जनता सोचती थी कि GST का मतलब ‘गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स’ होता है, लेकिन बस्ती के इस मामले ने सिद्ध कर दिया कि स्थानीय स्तर पर इसका असली मतलब ‘घूस, सेटिंग और ट्रांसफर’ है।
चोर को जब मिल जाए ‘महाचोर’
इस पूरे घटनाक्रम पर जिले के प्रबुद्ध और समझदार लोग एक बेहद ‘सकारात्मक’ बहस कर रहे हैं। कुछ लोगों का कहना है कि विधायक जी ने जो किया, बिल्कुल सही किया! आखिर वो GST की चोरी करने वाले भ्रष्ट ठेकेदारों से ही तो वसूली कर रहे हैं। लोहा ही लोहे को काटता है और चोर को ही महाचोर सीधा करता है। तर्क देखिए जनाब— जब ठेकेदार सरकार को चूना लगा सकता है, तो विधायक जी अपने क्षेत्र के विकास (या अपने परिवार के विकास) के लिए उसमें से अपना हक क्यों न मांगें?
पर सवाल यह उठता है कि यह बेहद ‘गोपनीय’ और ‘पवित्र’ डील मीडिया तक लीक कैसे हुई? जाहिर सी बात है, जब माननीय ने कमीशनखोरी की सारी सीमाएं लांघकर ठेकेदार का खून चूसना शुरू किया होगा, तो प्रताड़ित ठेकेदार ने भी आव देखा न ताव, ऑडियो-वीडियो वायरल कर माननीय को सरेआम ‘नंगा’ कर दिया।
सफेद कुर्ता, लग्जरी गाड़ियां और काले कारनामे
अक्सर गाँवों में जब सफेद चमकदार कुर्ता-पायजामा पहने, महंगी लग्जरी गाड़ियों से धूल उड़ाते हुए ये जनप्रतिनिधि निकलते हैं, तो सीधे-साधे ग्रामीणों को लगता है कि इनसे बड़ा ईमानदार और समाजसेवक तो धरती पर कोई पैदा ही नहीं हुआ। लेकिन हकीकत यह है कि इन गाड़ियों का ईंधन जनता के खून-पसीने की कमाई और विकास के पैसों की चोरी से आता है।
मजे की बात देखिए, जिन माननीय को शायद ये भी ठीक से न पता हो कि GST का फुल फॉर्म क्या है, जिन्हें ठीक से हस्ताक्षर करना न आता हो, वो कमीशन सेट करने के मामले में देश के सबसे बड़े वित्तीय सलाहकार बन जाते हैं। उन्हें ठेकेदार समझाता रह गया कि “हुजूर, यह सरकार का टैक्स है, इसमें से कमीशन कैसे दें?” लेकिन माननीय अड़ गए कि “फंड तो हमारी ही निधि से कटा है, तो टैक्स का आधा हिस्सा भी हमारा हुआ!”
जनता का ‘श्राप’ और लोकतंत्र का तमाशा
इस तरह के जनप्रतिनिधियों को पांच साल के लिए जनता के विकास के नाम पर आने वाले धन को लूटने का ‘लाइसेंस’ मिल जाता है। लेकिन बस्ती की जागरूक जनता अब पूछ रही है— “आखिर इन माननीयों का पेट कब भरेगा?” खैर, ठेकेदार और विधायक की इस नूराकुश्ती में नुकसान सिर्फ जनता का है। सड़क आज बनी, कल टूट जाएगी; पुलिया धंस जाएगी। लेकिन राहत की बात बस इतनी है कि जब ऐसे ‘कमीशनखोर’ नेता चुनाव हारते हैं, तो जनता को उनके हारने का दुख नहीं होता, बल्कि इस बात का जश्न होता है कि चलो… एक बला से तो पीछा छूटा! देश की बड़ी जांच एजेंसियों को अब नेताओं के घरों के चक्कर काटने चाहिए, क्योंकि असली ‘फाइनेंशियल जीनियस’ तो यहीं बैठे हैं।

















